नई दिल्ली फिर कप्तानी करने के लिए तैयार हैं और क्रिकेट में उनकी लीडरशिप एक बार फिर देखने को मिलेगी। हालांकि, फर्क इतना है कि इस बार वह टीम इंडिया नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के कप्तान यानी अध्यक्ष होंगे। तमाम ड्रामा के बीच रविवार को मुंबई के एक फाइव-स्टार होटल में बीसीसीआई के सभी सदस्यों की अनौपचारिक मीटिंग में इस बारे में फैसला लिया गया। आइए उनके सुपरहिट क्रिकेटर से बेहतरीन रणनीतिकार कप्तान और फिर क्रिकेट प्रशासक बनने के सफर पर नजर डालते हैं... गांगुली को 11 जून, 1992 में वनडे डेब्यू का मौका मिला, लेकिन वह कुछ खास नहीं कर सके। वेस्ट इंडीज के खिलाफ सिर्फ 3 रन पर आउट हो गए। इसके बाद उन्हें इंटरनैशनल क्रिकेट खेलने के लिए 4 का इंतजार करना पड़ा। 1996 में जब उन्हें वापस टीम में लाया गया तो उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ वनडे में 46 रन की पारी खेली, लेकिन असल दादागीरी की शुरुआत तो इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज से हुई। पढ़ें: यूं शुरू हुई गांगुली की 'दादागीरी' स्पिन गेंदबाजों के लिए सबसे घातक बल्लेबाजों में से एक माने जाने वाले 'रॉयल बंगाल टाइगर' ने टेस्ट क्रिकेट करियर की शुरुआत धमाकेदार तरीके से की। इंग्लैंड की पिचों पर जहां आज भी दौरा करने वाली टीम के धुरंधर खिलाड़ियों की घिग्घी बंध जाती है तो वहीं युवा सौरभ गांगुली ने डेब्यू टेस्ट में ही शतक जड़ डाला। जून, 1996 में लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर गांगुली ने 301 गेंदों का सामना करते हुए 20 चौके जड़े और 131 रन की रेकॉर्ड पारी खेली। बात यहीं खत्म नहीं हुई, इसके अगले ही मैच, जो नॉटिंगम में खेला गया था, में गांगुली ने 136 रन बनाते हुए एक और शानदार शतक ठोक दिया था। सचिन की कप्तानी में टर्निंग पॉइंटयह वह दौर था जब मोहम्मद अजहरुद्दीन की जगह महान सचिन तेंडुलकर कप्तान बने थे और टीम इंडिया वनडे में लगातार ओपनिंग जोड़ी की समस्या से जूझ रही थी। सचिन के साथ कभी अजय जडेजा उतरते तो कभी नयन मोंगिया, लेकिन कोई भी बड़ी साझेदारी नहीं कर पा रहा था। दूसरी ओर, इंग्लैंड में डेब्यू टेस्ट में शतक लगाकर गांगुली खुद को साबित कर चुके थे। ऐसे में सचिन के साथ उन्हें टाइटन कप के दौरान 26 अक्टूबर, 1996 को साउथ अफ्रीका के खिलाफ ओपनिंग में उतारा गया, जो उनके करियर के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस मैच में उन्होंने 54 रन बनाए। इसके बाद जो हुआ उसे हर कोई जानता है। यह जोड़ी वनडे क्रिकेट में 247 मैचों में 12400 रनों के साथ दुनिया की दूसरी सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग जोड़ी है। पढ़ें: 2000 में मिली कप्तानीक्रिकेट फैंस के बीच 'दादा' कहे जाने वाले सौरभ की इमेज कुछ ही समय में स्पिन के लिए घातक बल्लेबाज की हो गई। दो कदम आगे निकलकर दर्शनीय सिक्सर देखने के लिए लोग बेताब रहते थे। ऑफ साइड के भगवान कहे जाने वाले गांगुली को 2000 में उस वक्त लीडरशिप का मौका मिला, जब भारतीय क्रिकेट को मैच फिक्सिंग से दो-चार होना पड़ा था। गांगुली ने कप्तानी संभाली और फिर दुनिया को एक महान लीडरशिप से रूबरू करवाया। वर्ल्ड कप-2003 में गांगुली की ही कप्तानी में भारतीय टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया, जिसने भारतीय क्रिकेट को बदलकर रख दिया। ग्रेग चैपल विवादयह वह दौर था, जब गांगुली का सक्सेस ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा था। देश-विदेश, हर जगह उनकी कप्तानी हिट हो रही थी और टीम इंडिया सफलता के झंडे गाड़ रही थी। कहते हैं ना जो ऊपर चढ़ता है, उसे कभी न कभी नीचे भी आना होता है। ऐसा ही कुछ ही गांगुली के साथ। उन्हीं की सलाह पर टीम इंडिया का कोच ऑस्ट्रेलिया के ग्रेग चैपल को बनाया गया, जिसके बाद तमाम विवाद हुए और सौरभ को कप्तानी छोड़नी पड़ी। इस विवाद से गांगुली की परफॉर्मेंस पर भी असर पड़ा और उन्हें टीम से भी बाहर होना पड़ा। जबरदस्त लीडरशिप स्किलकप्तान के तौर पर सौरभ गांगुली में जबरदस्त लीडरशिप स्किल रही। चाहे फंसे हुए मैच को निकालना हो या फिर किसी खिलाड़ी की प्रतिभा पहचानकर उसका बेस्ट निकलवाना हो, गांगुली इसमें माहिर माने जाते हैं। कई बार तो उन्होंने दूसरों के लिए खुद जगह भी छोड़ी, जो अमूमन कोई कप्तान नहीं करता है। उन्होंने वीरेंदर सहवाग को खुद की जगह ओपनिंग में जगह दी तो शुरुआती कुछ मैचों में फेल होने वाले एमएस धोनी को अपनी जगह तीसरे नंबर पर बैटिंग करने भेजा। ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जो गांगुली को बेहतरीन लीडर साबित करते हैं। क्रिकेट के बाद क्रिकेट प्रशासक2008 में इंटरनैशनल क्रिकेट से रिटायमेंट के बाद वह क्रिकेट प्रशासन से जुड़े। इसका श्रेय उनके मेंटॉर और दिवंगत बीसीसीआई अध्यक्ष जगमोहन डालमिया को जाता है। बंगाल क्रिकेट असोसिएशन (CAB) से गांगुली जुड़े। 2015 में डालमिया के निधन के बाद उन्होंने राज्य संघ के अध्यक्ष की कमान संभाली। हाल ही में उन्हें दोबारा निर्विरोध कैब प्रेजिडेंट चुना गया है और वह नई पारी बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में खेलने को तैयार हैं।
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